नमाज़ गाइड · नए सीखने वालों और लौटने वालों के लिए
नमाज़ कैसे पढ़ें, क़दम-ब-क़दम
दो रकअत की नमाज़ में पहले अल्लाहु अकबर से सलाम तक जो कुछ कहा और किया जाता है, सब कुछ। हर क़दम के साथ अरबी पाठ, आसान उच्चारण, अर्थ और उसका स्रोत है।
वुज़ू करें, क़िबला की ओर मुँह करें और नमाज़ की नीयत करें। अल्लाहु अकबर कहें, अल-फ़ातिहा और एक छोटी सूरह पढ़ें, रुकू करें, खड़े हों, दो सज्दे करें, फिर अगली रकअत के लिए खड़े हों। आख़िरी रकअत के बाद तशह्हुद और दुरूद के लिए बैठें, और दाएँ फिर बाएँ अस-सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह कहकर नमाज़ ख़त्म करें। नीचे दो रकअत वाली नमाज़, जैसे फ़ज्र, का हर क़दम अरबी पाठ, उच्चारण और अर्थ के साथ दिया गया है।
शुरू करने से पहले
- नमाज़ का वक़्त हो गया हो। हर नमाज़ का अपना वक़्त है (कुरआन 4:103)। अपने शहर के लिए आज के नमाज़ के समय देखें।
- आपका वुज़ू हो। नमाज़ के लिए वुज़ू ज़रूरी है (देखें सहीह बुख़ारी 135, सहीह मुस्लिम 225)। देखें वुज़ू कैसे करें (अंग्रेज़ी), और अगर पूरा ग़ुस्ल ज़रूरी हो तो ग़ुस्ल (अंग्रेज़ी)।
- शरीर, कपड़े और जगह पाक हों, और शरीर उतना ढका हो जितना नमाज़ में ज़रूरी है।
- आप क़िबला की ओर हों, यानी मक्का में काबा की दिशा (कुरआन 2:144)। क़िबला फ़ाइंडर इस्तेमाल करें।
दो रकअत नमाज़, क़दम-ब-क़दम
एक रकअत क़ियाम (खड़े होना), रुकू और दो सज्दों का एक चक्र है। फ़ज्र दो रकअत है, इसलिए नीचे के क़दम पूरी फ़ज्र की नमाज़ हैं। लंबी नमाज़ें इसी चक्र को दोहराती हैं।
नीयत करें
दिल में नीयत करें कि आप कौन-सी नमाज़ पढ़ने जा रहे हैं, जैसे फ़ज्र की दो फ़र्ज़ रकअतें। नीयत दिल में होती है; इसे ज़ोर से बोलना ज़रूरी नहीं। नीयत के बारे में देखें सहीह बुख़ारी 1 और सहीह मुस्लिम 1907।
तकबीर-ए-तहरीमा कहें
दोनों हाथ कानों या कंधों तक उठाएँ और कहें:
اللَّهُ أَكْبَرُ
अल्लाहु अकबर
अल्लाह सबसे बड़ा है।
तकबीर से आप नमाज़ में दाख़िल होते हैं · सुनन अबू दाऊद 61, जामे तिर्मिज़ी 3
अब से उस जगह देखें जहाँ सज्दे में माथा रखेंगे, और स्थिर रहें।
हाथ बाँधें और सना पढ़ें
दायाँ हाथ बाएँ हाथ पर रखें और आहिस्ता से शुरुआती दुआ पढ़ें:
سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَبِحَمْدِكَ، وَتَبَارَكَ اسْمُكَ، وَتَعَالَى جَدُّكَ، وَلَا إِلَهَ غَيْرُكَ
सुब्हानकल्लाहुम्मा व बिहम्दिक, व तबारकस्मुक, व तआला जद्दुक, व ला इलाहा ग़ैरुक
ऐ अल्लाह, तू पाक है और तेरी ही प्रशंसा है। तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी शान ऊँची है, और तेरे सिवा कोई माबूद नहीं।
सुनन अबू दाऊद 775, जामे तिर्मिज़ी 243
पनाह माँगें, बिस्मिल्लाह कहें और अल-फ़ातिहा पढ़ें
आहिस्ता से कहें:
أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ
अऊज़ु बिल्लाहि मिनश-शैतानिर-रजीम
मैं धुतकारे हुए शैतान से अल्लाह की पनाह माँगता हूँ।
फिर सूरह अल-फ़ातिहा पढ़ें। यह हर रकअत में पढ़ी जाती है (देखें सहीह बुख़ारी 756, सहीह मुस्लिम 394)।
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
बिस्मिल्लाहिर-रहमानिर-रहीम
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दया वाला है।
ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ
अल-हम्दु लिल्लाहि रब्बिल-आलमीन
हर प्रकार की प्रशंसा उस अल्लाह[1] के लिए है, जो सारे संसारों का पालनहार[2] है।
ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
अर-रहमानिर-रहीम
जो अत्यंत दयावान्, असीम दया वाला[3] है।
مَٰلِكِ يَوْمِ ٱلدِّينِ
मालिकि यौमिद-दीन
जो बदले[4] के दिन का मालिक है।
إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ
इय्याका नअबुदु व इय्याका नस्तईन
(ऐ अल्लाह!) हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझी से सहायता माँगते[5] हैं।
ٱهْدِنَا ٱلصِّرَٰطَ ٱلْمُسْتَقِيمَ
इहदिनस-सिरातल-मुस्तक़ीम
हमें सीधे मार्ग पर चला।
صِرَٰطَ ٱلَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ غَيْرِ ٱلْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا ٱلضَّآلِّينَ
सिरातल-लज़ीना अनअमता अलैहिम, ग़ैरिल-मग़ज़ूबि अलैहिम व लज़्ज़ाल्लीन
उन लोगों का मार्ग, जिनपर तूने अनुग्रह किया।[6] उनका नहीं, जिनपर तेरा प्रकोप[7] हुआ और न ही उनका, जो गुमराह हैं।
कुरआन 1:1-7 · अल-फ़ातिहा ऑडियो के साथ पढ़ें। फिर आमीन कहें (ऐ अल्लाह, क़बूल फ़रमा)।
फ़ुटनोट
1:2 [1] 'अल्लाह' का अर्थ 'ह़क़ीक़ी पूज्य' है। जो संसार के रचयिता, विधाता के लिए विशिष्ट है। [2] 'पालनहार' होने का अर्थ यह है कि जिस ने इस संसार की रचना करके इसके प्रतिपालन की ऐसी विचित्र व्यवस्था की है कि सभी को अपनी आवश्यक्ता तथा स्थिति के अनुसार सब कुछ मिल रहा है। यह संसार का पूरा कार्य, सूर्य, वायु, जल, धरती सब जीवन की रक्षा एवं जीवन की प्रत्येक योग्यता की रखवाली में लगे हुए हैं। इससे सत्य पूज्य का परिचय एवं ज्ञान होता है।
1:3 [3] अर्थात वह संसार की व्यवस्था एवं रक्षा अपनी अपार दया से कर रहा है। अतः प्रशंसा एवं पूजा के योग्य भी मात्र वही है।
1:4 [4] बदले के दिन से अभिप्राय प्रलय का दिन है। आयत का भावार्थ यह है कि सत्य धर्म बदले के नियम पर आधारित है। अर्थात जो जैसा करेगा वैसा भरेगा। जैसे कोई जौ बोकर गेहूँ की, तथा आग में कूदकर शीतल होने की आशा नहीं कर सकता, ऐसे ही भले-बुरे कर्मों का भी अपना स्वभाविक गुण और प्रभाव होता है। फिर संसार में भी कुकर्मों का दुष्परिणाम कभी-कभी देखा जाता है। परंतु यह भी देखा जाता है कि दुराचारी और अत्याचारी सुखी जीवन निर्वाह कर लेता है, और उसकी पकड़ इस संसार में नहीं होती। इसलिए न्याय के लिए एक दिन अवश्य होना चाहिए। उसी का नाम 'क़ियामत' (प्रलय का दिन) है। "बदले के दिन का मालिक" होने का अर्थ यह है कि संसार में भी उसने इनसानों को अधिकार और राज्य दिए हैं। परंतु प्रलय के दिन सब अधिकार उसी का रहेगा। और वही न्यायपूर्वक सबको उनके कर्मों का प्रतिफल देगा।
1:5 [5] इन आयतों में प्रार्थना के रूप में मात्र अल्लाह ही की पूजा और उसी को सहायतार्थ गुहारने की शिक्षा दी गई है। इस्लाम की परिभाषा में इसी का नाम 'तौह़ीद' (एकेश्वरवाद) है, जो सत्य धर्म का आधार है। और अल्लाह के सिवा या उसके साथ किसी देवी-देवता आदि को पुकारना, उसकी पूजा करना, किसी प्रत्यक्ष साधन के बिना किसी को सहायता के लिये गुहारना, किसी व्यक्ति और वस्तु में अल्लाह का कोई विशेष गुण मानना आदि एकेश्वरवाद (तौह़ीद) के विरुद्ध हैं जो अक्षम्य पाप हैं। जिसके साथ कोई पुण्य का कार्य मान्य नहीं।
1:7 [6] इस आयत में सीधे मार्ग का चिह्न यह बताया गया है कि यह उनका मार्ग है, जिनपर अल्लाह का पुरस्कार हुआ। उनका नहीं, जो प्रकोपित हुए और न उनका, जो सत्य मार्ग से बहक गए। [7] 'प्रकोपित' से अभिप्राय वे हैं, जो सत्य धर्म को, जानते हुए, मात्र अभिमान अथवा अपने पुर्वजों की परंपरागत प्रथा के मोह में अथवा अपनी बड़ाई के जाने के भय से, नहीं मानते। 'गुमराह' से अभिप्रेत वे हैं, जो सत्य धर्म के होते हुए, उससे दूर हो गए और देवी-देवताओं आदि में अल्लाह के विशेष गुण मानकर उनको रोग निवारण, दुःख दूर करने और सुख-संतान आदि देने के लिए गुहारने लगे।
एक और सूरह पढ़ें
पहली दो रकअतों में अल-फ़ातिहा के बाद कोई भी सूरह या कुछ आयतें पढ़ें। शुरुआत के लिए एक छोटी सूरह, सूरह अल-इख़लास:
قُلْ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ (1) ٱللَّهُ ٱلصَّمَدُ (2) لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ (3) وَلَمْ يَكُن لَّهُۥ كُفُوًا أَحَدٌۢ (4)
क़ुल हुवल्लाहु अहद। अल्लाहुस-समद। लम यलिद व लम यूलद। व लम यकुन लहू कुफ़ुवन अहद।
(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक है।[1] अल्लाह बेनियाज़ है। न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है। और न कोई उसका समकक्ष है।[2]
कुरआन 112:1-4 · सूरह अल-इख़लास
फ़ुटनोट
112:1 [1] आयत संख्या 1 में 'अह़द' शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है, उसके अस्तित्व एवं गुणों में कोई साझी नहीं है। यहाँ 'अह़द' शब्द का प्रयोग यह बताने के लिए किया गया है कि वह अकेला है। वह वृक्ष के समान एक नहीं है जिसकी अनेक शाखाएँ होती हैं। आयत संख्या 2 में 'समद' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है अब्रण होना। अर्थात जिसमें कोई छिद्र न हो जिससे कुछ निकले, या वह किसी से निकले। और आयत संख्या 3 इसी अर्थ की व्याख्या करती है कि न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है।
112:4 [2] इस आयत में यह बताया गया है कि उसकी प्रतिमा तथा उसके बराबर और समतुल्य कोई नहीं है। उसके कर्म, गुण और अधिकार में कोई किसी रूप में बराबर नहीं। न उसकी कोई जाति है न परिवार। इन आयतों में क़ुरआन उन विषयों को जो लोगों के तौह़ीद से फिसलने का कारण बने, उसे अनेक रूप में वर्णित करता है। और देवियों और देवताओं के विवाहों और उन के पुत्र और पौत्रों का जो विवरण देव मालाओं में मिलता है, क़ुरआन ने उसका खंडन किया है।
रुकू करें
अल्लाहु अकबर कहकर झुकें, पीठ सीधी रखें और हाथ घुटनों पर रखें। तीन बार कहें:
سُبْحَانَ رَبِّيَ الْعَظِيمِ
सुब्हाना रब्बियल-अज़ीम
पाक है मेरा रब, जो सबसे महान है।
सहीह मुस्लिम 772 (हुज़ैफ़ा)
रुकू से उठें
सीधे खड़े होते हुए कहें:
سَمِعَ اللَّهُ لِمَنْ حَمِدَهُ
समिअल्लाहु लिमन हमिदह
अल्लाह उसकी सुनता है जो उसकी प्रशंसा करता है।
फिर, स्थिर खड़े होकर:
رَبَّنَا وَلَكَ الْحَمْدُ
रब्बना व लकल-हम्द
ऐ हमारे रब, सारी प्रशंसा तेरे ही लिए है।
सहीह बुख़ारी 789
सज्दा करें
अल्लाहु अकबर कहकर सज्दे में जाएँ। सात अंग ज़मीन को छूते हैं: नाक के साथ माथा, दोनों हाथ, दोनों घुटने और दोनों पैरों की उँगलियाँ (सहीह बुख़ारी 812, सहीह मुस्लिम 490)। तीन बार कहें:
سُبْحَانَ رَبِّيَ الْأَعْلَى
सुब्हाना रब्बियल-आला
पाक है मेरा रब, जो सबसे ऊँचा है।
सहीह मुस्लिम 772 (हुज़ैफ़ा)
सज्दे में बंदा अपने रब के सबसे क़रीब होता है, इसलिए यहाँ दुआ भी करें (सहीह मुस्लिम 482)।
दो सज्दों के बीच बैठें
अल्लाहु अकबर कहकर इत्मीनान से बैठें। कहें:
رَبِّ اغْفِرْ لِي، رَبِّ اغْفِرْ لِي
रब्बिग़फ़िर ली, रब्बिग़फ़िर ली
मेरे रब, मुझे माफ़ कर दे। मेरे रब, मुझे माफ़ कर दे।
सुनन इब्न माजह 897, सुनन अबू दाऊद 874
दूसरा सज्दा करें
अल्लाहु अकबर कहकर पहले की तरह दूसरा सज्दा करें और तीन बार सुब्हाना रब्बियल-आला कहें। इससे पहली रकअत पूरी होती है।
दूसरी रकअत के लिए खड़े हों
अल्लाहु अकबर कहकर खड़े हों। क़दम 4 से 10 दोहराएँ: अल-फ़ातिहा, दूसरी सूरह, रुकू, खड़ा होना, दो सज्दे और उनके बीच बैठना। शुरुआती दुआ (सना) दोबारा नहीं पढ़ी जाती।
बैठकर तशह्हुद पढ़ें
दूसरी रकअत के दूसरे सज्दे के बाद बैठे रहें और तशह्हुद (अत-तहिय्यात) पढ़ें। बहुत से लोग गवाही के शब्दों पर दाहिने हाथ की शहादत की उँगली उठाते हैं।
التَّحِيَّاتُ لِلَّهِ وَالصَّلَوَاتُ وَالطَّيِّبَاتُ، السَّلَامُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيُّ وَرَحْمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ، السَّلَامُ عَلَيْنَا وَعَلَى عِبَادِ اللَّهِ الصَّالِحِينَ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ
अत-तहिय्यातु लिल्लाहि वस-सलवातु वत-तय्यिबात। अस-सलामु अलैका अय्युहन-नबिय्यु व रहमतुल्लाहि व बरकातुह। अस-सलामु अलैना व अला इबादिल्लाहिस-सालिहीन। अश्हदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह, व अश्हदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुह।
सारे अभिवादन, नमाज़ें और पाकीज़ा बातें अल्लाह के लिए हैं। ऐ नबी, आप पर सलाम हो और अल्लाह की रहमत और उसकी बरकतें। हम पर और अल्लाह के नेक बंदों पर सलाम हो। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद उसके बंदे और रसूल हैं।
इब्न मसऊद का तशह्हुद · सहीह बुख़ारी 831, सहीह मुस्लिम 402
नबी पर दुरूद भेजें
आख़िरी बैठक में नबी ﷺ पर दुरूद पढ़ें:
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ
अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन व अला आलि मुहम्मद, कमा सल्लैता अला इब्राहीमा व अला आलि इब्राहीम, इन्नका हमीदुन मजीद। अल्लाहुम्मा बारिक अला मुहम्मदिन व अला आलि मुहम्मद, कमा बारकता अला इब्राहीमा व अला आलि इब्राहीम, इन्नका हमीदुन मजीद।
ऐ अल्लाह, मुहम्मद और मुहम्मद के घरवालों पर रहमत भेज, जैसे तूने इब्राहीम और इब्राहीम के घरवालों पर रहमत भेजी; बेशक तू प्रशंसा के योग्य, बड़ी शान वाला है। ऐ अल्लाह, मुहम्मद और मुहम्मद के घरवालों पर बरकत भेज, जैसे तूने इब्राहीम और इब्राहीम के घरवालों पर बरकत भेजी; बेशक तू प्रशंसा के योग्य, बड़ी शान वाला है।
सहीह बुख़ारी 3370 (कअब बिन उजरा)
एक छोटी दुआ करें
सलाम से पहले अल्लाह से कोई भी भलाई माँगें। कुरआन की एक दुआ जो बहुत से लोग पढ़ते हैं:
رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ
रब्बना आतिना फ़िद-दुनिया हसनह, व फ़िल-आख़िरति हसनह, व क़िना अज़ाबन-नार
तथा उनमें से कोई ऐसा है, जो कहता है : ऐ हमारे पालनहार! हमें दुनिया में भलाई तथा आख़िरत में भी भलाई दे और हमें आग के अज़ाब से बचा।
सलाम के साथ ख़त्म करें
चेहरा दाईं ओर घुमाकर सलाम कहें, फिर बाईं ओर घुमाकर दोबारा कहें (सहीह मुस्लिम 582)। आपकी नमाज़ पूरी हो गई।
السَّلَامُ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَةُ اللَّهِ
अस-सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह
तुम पर सलामती हो, और अल्लाह की रहमत।
अर्थों का अनुवाद: Azizul Haq Al-Omari, QuranEnc.com, संस्करण 1.1.5। अनुवाद कुरआन के अर्थ बताता है। असल कुरआन अरबी पाठ है।
तीन और चार रकअत की नमाज़ें
मग़रिब (3), और ज़ुहर, अस्र और इशा (4) के लिए, पहली दो रकअतें ऊपर की तरह पढ़ें। दूसरी रकअत में तशह्हुद के बाद दुरूद या सलाम न पढ़ें। अल्लाहु अकबर कहकर तीसरी रकअत के लिए खड़े हों।
फ़र्ज़ नमाज़ की तीसरी और चौथी रकअत में सिर्फ़ अल-फ़ातिहा पढ़ें, कोई और सूरह नहीं। आख़िरी रकअत के बाद बैठकर तशह्हुद, दुरूद और दुआ पढ़ें, फिर सलाम के साथ ख़त्म करें।
फ़ज्र, और मग़रिब और इशा की पहली दो रकअतें, इमाम ऊँची आवाज़ में पढ़ता है (और अकेले नमाज़ पढ़ने वाला मर्द भी, ज़्यादातर मसलकों में)। ज़ुहर और अस्र आहिस्ता पढ़ी जाती हैं।
हर नमाज़ की रकअतें
पाँचों रोज़ाना नमाज़ों में कुल 17 फ़र्ज़ रकअतें हैं। उनके आसपास की सुन्नत नमाज़ें वे हैं जिन्हें नबी ﷺ पाबंदी से पढ़ते थे। बारह सुन्नत रकअतों की फ़ज़ीलत के बारे में देखें सहीह मुस्लिम 728; ये बारह जामे तिर्मिज़ी 415 में गिनाई गई हैं।
| नमाज़ | पहले सुन्नत | फ़र्ज़ | बाद में सुन्नत | क़िरअत |
|---|---|---|---|---|
| फ़ज्र | 2 | 2 | — | ऊँची आवाज़ में |
| ज़ुहर | 4 (या 2) | 4 | 2 | आहिस्ता |
| अस्र | 4 (ऐच्छिक) | 4 | — | आहिस्ता |
| मग़रिब | — | 3 | 2 | पहली दो ऊँची आवाज़ में |
| इशा | 4 (ऐच्छिक) | 4 | 2, फिर वित्र | पहली दो ऊँची आवाज़ में |
ज़ुहर: हनफ़ी मसलक पहले 4 रकअत सुन्नत-ए-मुअक्कदा गिनता है; शाफ़ई और हंबली मसलक 2 मुअक्कदा (4 मुस्तहब) गिनते हैं, इब्न उमर की 2 वाली रिवायत के आधार पर (सहीह बुख़ारी 1180)। वित्र: हनफ़ियों के यहाँ वाजिब और हमेशा 3 रकअत; बाक़ी तीन मसलकों में 1 या ज़्यादा रकअत की ताकीदी सुन्नत।
पूरी जानकारी, जिसमें जुमा, ईद, तरावीह और तहज्जुद भी हैं: हर नमाज़ में कितनी रकअतें (अंग्रेज़ी)।
मसलकों के बीच छोटे फ़र्क़
चारों सुन्नी मसलक एक ही नमाज़ पढ़ते हैं। कुछ बारीकियों में उनमें फ़र्क़ है, और हर एक दलील पर चलता है। इनमें से कोई भी फ़र्क़ नमाज़ को बातिल नहीं करता।
- हाथ: हनफ़ी नाफ़ के नीचे बाँधते हैं; शाफ़ई और हंबली सीने पर या उससे थोड़ा नीचे; बहुत से मालिकी हाथ बग़ल में छोड़ देते हैं।
- हाथ उठाना (रफ़ा यदैन): हनफ़ी सिर्फ़ तकबीर-ए-तहरीमा पर उठाते हैं; शाफ़ई और हंबली रुकू से पहले और बाद में भी उठाते हैं (सहीह बुख़ारी 735)।
- शुरुआती दुआ: हनफ़ी और हंबली आम तौर पर सुब्हानकल्लाहुम्मा पढ़ते हैं; शाफ़ई अक्सर वज्जहतु वजहिया पढ़ते हैं (सहीह मुस्लिम 771)। मालिकी फ़र्ज़ नमाज़ में शुरुआती दुआ नहीं पढ़ते।
- आमीन: शाफ़ई और हंबली ऊँची आवाज़ वाली नमाज़ों में अल-फ़ातिहा के बाद ज़ोर से कहते हैं; हनफ़ी आहिस्ता कहते हैं।
जो आपको सिखाया गया है या आपकी स्थानीय मस्जिद जिस पर चलती है, उसी पर चलें। इनमें से किसे चुनते हैं, उससे ज़्यादा अहम पाबंदी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अगर मुझे अभी अरबी में अल-फ़ातिहा नहीं आती, तो क्या मैं नमाज़ पढ़ सकता हूँ?
हाँ, अभी से शुरू करें और साथ-साथ सीखते रहें। एक आदमी ने नबी ﷺ से कहा कि वह कुरआन का कुछ भी नहीं सीख सकता, तो उसे इसकी जगह सुब्हानल्लाह, वल-हम्दु लिल्लाह, व ला इलाहा इल्लल्लाह, वल्लाहु अकबर, व ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह कहना सिखाया गया (सुनन अबू दाऊद 832)। जितनी जल्दी हो सके अल-फ़ातिहा सीख लें, क्योंकि नमाज़ अरबी में पढ़ी जाती है।
क्या नीयत ज़ोर से बोलनी ज़रूरी है?
नहीं। नीयत दिल में होती है (सहीह बुख़ारी 1)। हनफ़ी और शाफ़ई मसलक के कुछ उलमा ध्यान के लिए इसे आहिस्ता बोलना मददगार मानते हैं; दूसरे इसे नापसंद करते हैं। हर हाल में, दिल की नीयत से नमाज़ सही है।
नमाज़ किन चीज़ों से टूटती है?
जान-बूझकर बात करना, खाना या पीना, ज़ोर से हँसना, सीना क़िबला से फेर लेना, वुज़ू टूट जाना, या रुकू या सज्दे जैसा कोई रुक्न छोड़ देना। नमाज़ में बात करने के बारे में देखें सहीह मुस्लिम 537।
अगर मैं कोई क़दम भूल जाऊँ या रकअतों की गिनती भूल जाऊँ तो?
जिस पर यक़ीन हो उसी पर बुनियाद रखें और दो अतिरिक्त सज्दे करें, जिन्हें सज्दा-ए-सह्व कहते हैं (सहीह मुस्लिम 571)। देखें सज्दा-ए-सह्व (अंग्रेज़ी)।
क्या औरतों की नमाज़ अलग है?
क़दम और शब्द वही हैं। कुछ मसलक, ख़ासकर हनफ़ी, औरतों के लिए हालत में छोटे फ़र्क़ बताते हैं, जैसे सज्दे में बाज़ुओं को शरीर के ज़्यादा क़रीब रखना।
दो रकअत नमाज़ में कितना समय लगता है?
इत्मीनान से पढ़ने पर लगभग तीन से पाँच मिनट। इत्मीनान ज़रूरी है: नबी ﷺ ने जल्दी-जल्दी नमाज़ पढ़ने वाले एक आदमी से दोबारा पढ़ने को कहा, और उसे हर हालत में ठहरना सिखाया (सहीह बुख़ारी 757)।
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यह गाइड आम तरीक़े को उसके स्रोतों के साथ बताती है। यह फ़तवा नहीं है। अगर आपकी स्थिति अलग है, तो किसी भरोसेमंद आलिम से पूछें।