सूरह 80 (कुल 114) · मक्की

सूरह अबस (त्योरी चढ़ाई)

سُورَةُ عَبَسَ
42 आयतें

अर्थों का अनुवाद: Azizul Haq Al-Omari, QuranEnc.com, संस्करण 1.1.5। अनुवाद कुरआन के अर्थ बताता है। असल कुरआन अरबी पाठ है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
1
عَبَسَ وَتَوَلَّىٰٓ
उस (नबी) ने त्योरी चढ़ाई और मुँह फेर लिया।
लिंक 80:1
2
أَن جَآءَهُ ٱلْأَعْمَىٰ
इस कारण कि उनके पास अंधा आया।
लिंक 80:2
3
وَمَا يُدْرِيكَ لَعَلَّهُۥ يَزَّكَّىٰٓ
और आपको क्या मालूम शायद वह पवित्रता प्राप्त कर ले।
लिंक 80:3
4
أَوْ يَذَّكَّرُ فَتَنفَعَهُ ٱلذِّكْرَىٰٓ
या नसीहत ग्रहण करे, तो वह नसीहत उसे लाभ दे।
लिंक 80:4
5
أَمَّا مَنِ ٱسْتَغْنَىٰ
लेकिन जो बेपरवाह हो गया।
लिंक 80:5
6
فَأَنتَ لَهُۥ تَصَدَّىٰ
तो आप उसके पीछे पड़ रहे हैं।
लिंक 80:6
7
وَمَا عَلَيْكَ أَلَّا يَزَّكَّىٰ
हालाँकि आपपर कोई दोष नहीं कि वह पवित्रता ग्रहण नहीं करता।
लिंक 80:7
8
وَأَمَّا مَن جَآءَكَ يَسْعَىٰ
लेकिन जो व्यक्ति आपके पास दौड़ता हुआ आया।
लिंक 80:8
9
وَهُوَ يَخْشَىٰ
और वह डर (भी) रहा है।
लिंक 80:9
10
فَأَنتَ عَنْهُ تَلَهَّىٰ
तो आप उसकी ओर ध्यान नहीं देते।[1]
फ़ुटनोट[1] (1-10) भावार्थ यह है कि सत्य के प्रचारक का यह कर्तव्य है कि जो सत्य की खोज में हो, भले ही वह दरिद्र हो, उसी के सुधार पर ध्यान दे। और जो अभिमान के कारण सत्य की परवाह नहीं करते उनके पीछे समय न गवाँए। आपका यह दायित्व भी नहीं है कि उन्हें अपनी बात मनवा दें।
लिंक 80:10
11
كَلَّآ إِنَّهَا تَذْكِرَةٌۭ
ऐसा हरगिज़ नहीं चाहिए, यह (क़ुरआन) तो एक उपदेश है।
लिंक 80:11
12
فَمَن شَآءَ ذَكَرَهُۥ
अतः जो चाहे, उसे याद करे।
लिंक 80:12
13
فِى صُحُفٍۢ مُّكَرَّمَةٍۢ
(यह क़ुरआन) सम्मानित सहीफ़ों (ग्रंथों) में है।
लिंक 80:13
14
مَّرْفُوعَةٍۢ مُّطَهَّرَةٍۭ
जो उच्च स्थान वाले तथा पवित्र हैं।
लिंक 80:14
15
بِأَيْدِى سَفَرَةٍۢ
ऐसे लिखने वालों (फ़रिश्तों) के हाथों में हैं।
लिंक 80:15
16
كِرَامٍۭ بَرَرَةٍۢ
जो माननीय और नेक हैं।[2]
फ़ुटनोट[2] (11-16) इनमें क़ुरआन की महानता को बताया गया है कि यह एक स्मृति (याद दहानी) है। किसी पर थोपने के लिए नहीं आया है। बल्कि वह तो फ़रिश्तों के हाथों में स्वर्ग में एक पवित्र शास्त्र के अंदर सुरक्षित है। और वहीं से वह (क़ुरआन) इस संसार में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारा जा रहा है।
लिंक 80:16
17
قُتِلَ ٱلْإِنسَـٰنُ مَآ أَكْفَرَهُۥ
सर्वनाश हो मनुष्य का, वह कितना कृतघ्न (नाशुक्रा) है।
लिंक 80:17
18
مِنْ أَىِّ شَىْءٍ خَلَقَهُۥ
(अल्लाह ने) उसे किस चीज़ से पैदा किया?
लिंक 80:18
19
مِن نُّطْفَةٍ خَلَقَهُۥ فَقَدَّرَهُۥ
एक नुत्फ़े (वीर्य) से उसे पैदा किया, फिर विभिन्न चरणों में उसकी रचना की।
लिंक 80:19
20
ثُمَّ ٱلسَّبِيلَ يَسَّرَهُۥ
फिर उसके लिए रास्ता आसान कर दिया।
लिंक 80:20
21
ثُمَّ أَمَاتَهُۥ فَأَقْبَرَهُۥ
फिर उसे मृत्यु दी, फिर उसे क़ब्र में रखवाया।
लिंक 80:21
22
ثُمَّ إِذَا شَآءَ أَنشَرَهُۥ
फिर जब वह चाहेगा, उसे उठाएगा।
लिंक 80:22
23
كَلَّا لَمَّا يَقْضِ مَآ أَمَرَهُۥ
हरगिज़ नहीं, अभी तक उसने उसे पूरा नहीं किया, जिसका अल्लाह ने उसे आदेश दिया था।[3]
फ़ुटनोट[3] (17-23) तक विश्वासहीनों पर धिक्कार है कि यदि वे अपने अस्तित्व पर विचार करें कि हमने कितनी तुच्छ वीर्य की बूँद से उसकी रचना की तथा अपनी दया से उसे चेतना और समझ दी। परंतु इन सब उपकारों को भूलकर कृतघ्न बना हुआ है, और उपासना अन्य की करता है।
लिंक 80:23
24
فَلْيَنظُرِ ٱلْإِنسَـٰنُ إِلَىٰ طَعَامِهِۦٓ
अतः इनसान को चाहिए कि अपने भोजन को देखे।
लिंक 80:24
25
اَنَّا صَبَبْنَا ٱلْمَآءَ صَبًّۭا
कि हमने ख़ूब पानी बरसाया।
लिंक 80:25
26
ثُمَّ شَقَقْنَا ٱلْأَرْضَ شَقًّۭا
फिर हमने धरती को विशेष रूप से फाड़ा।
लिंक 80:26
27
فَأَنۢبَتْنَا فِيهَا حَبًّۭا
फिर हमने उसमें अनाज उगाया।
लिंक 80:27
28
وَعِنَبًۭا وَقَضْبًۭا
तथा अंगूर और (मवेशियों का) चारा।
लिंक 80:28
29
وَزَيْتُونًۭا وَنَخْلًۭا
तथा ज़ैतून और खजूर के पेड़।
लिंक 80:29
30
وَحَدَآئِقَ غُلْبًۭا
तथा घने बाग़।
लिंक 80:30
31
وَفَـٰكِهَةًۭ وَأَبًّۭا
तथा फल और चारा।
लिंक 80:31
32
مَّتَـٰعًۭا لَّكُمْ وَلِأَنْعَـٰمِكُمْ
तुम्हारे लिए तथा तुम्हारे पशुओं के लिए जीवन-सामग्री के रूप में।[4]
फ़ुटनोट[4] (24-32) इन आयतों में इनसान के जीवन साधनों को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो अल्लाह की अपार दया की परिचायक हैं। अतः जब सारी व्यवस्था वही करता है, तो फिर उसके इन उपकारों पर इनसान के लिए उचित था कि उसी की बात माने और उसी के आदेशों का पालन करे जो क़ुरआन के माध्यम से अंतिम नबी मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्म) द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा है। (दावतुल क़ुरआन)
लिंक 80:32
33
فَإِذَا جَآءَتِ ٱلصَّآخَّةُ
तो जब कानों को बहरा कर देने वाली प्रचंड आवाज़ (क़ियामत) आ जाएगी।
लिंक 80:33
34
يَوْمَ يَفِرُّ ٱلْمَرْءُ مِنْ أَخِيهِ
जिस दिन इनसान अपने भाई से भागेगा।
लिंक 80:34
35
وَأُمِّهِۦ وَأَبِيهِ
तथा अपनी माता और अपने पिता (से)।
लिंक 80:35
36
وَصَـٰحِبَتِهِۦ وَبَنِيهِ
तथा अपनी पत्नी और अपने बेटों से।
लिंक 80:36
37
لِكُلِّ ٱمْرِئٍۢ مِّنْهُمْ يَوْمَئِذٍۢ شَأْنٌۭ يُغْنِيهِ
उस दिन उनमें से प्रत्येक व्यक्ति की ऐसी स्थिति होगी, जो उसे (दूसरों से) बेपरवाह कर देगी।
लिंक 80:37
38
وُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍۢ مُّسْفِرَةٌۭ
उस दिन कुछ चेहरे रौशन होंगे।
लिंक 80:38
39
ضَاحِكَةٌۭ مُّسْتَبْشِرَةٌۭ
हँसते हुए, प्रसन्न होंगे।
लिंक 80:39
40
وَوُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍ عَلَيْهَا غَبَرَةٌۭ
तथा कुछ चेहरों उस दिन धूल से ग्रस्त होंगे।
लिंक 80:40
41
تَرْهَقُهَا قَتَرَةٌ
उनपर कालिमा छाई होगी।
लिंक 80:41
42
أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْكَفَرَةُ ٱلْفَجَرَةُ
वही काफ़िर और कुकर्मी लोग हैं।[5]
फ़ुटनोट[5] (33-42) इन आयतों का भावार्थ यह है कि संसार में किसी पर कोई आपदा आती है, तो उसके अपने लोग उसकी सहायता और रक्षा करते हैं। परंतु प्रलय के दिन सबको अपनी-अपनी पड़ी होगी और उसके कर्म ही उसकी रक्षा करेंगे।
लिंक 80:42

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